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Methodist Church Nadiad

अय्यूब २६

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तब अय्यूब ने कहा,

“निर्बल जन की तूने क्या ही बड़ी सहायता की, और जिसकी बाँह में सामर्थ्य नहीं, उसको तूने कैसे सम्भाला है?

निर्बुद्धि मनुष्य को तूने क्या ही अच्छी सम्मति दी, और अपनी खरी बुद्धि कैसी भली भाँति प्रगट की है?

तूने किसके हित के लिये बातें कही? और किसके मन की बातें तेरे मुँह से निकलीं?”

“बहुत दिन के मरे हुए लोग भी जलनिधि और उसके निवासियों के तले तड़पते हैं।

अधोलोक उसके सामने उघड़ा रहता है, और विनाश का स्थान ढँप नहीं सकता। (भज. 139:8-11 नीति. 15:11, इब्रा. 4:13)

वह उत्तर दिशा को निराधार फैलाए रहता है, और बिना टेक पृथ्वी को लटकाए रखता है।

वह जल को अपनी काली घटाओं में बाँध रखता , और बादल उसके बोझ से नहीं फटता।

वह अपने सिंहासन के सामने बादल फैलाकर चाँद को छिपाए रखता है।

१०उजियाले और अंधियारे के बीच जहाँ सीमा बंधी है, वहाँ तक उसने जलनिधि का सीमा ठहरा रखी है।

११उसकी घुड़की से आकाश के खम्भे थरथराते और चकित होते हैं।

१२वह अपने बल से समुद्र को शान्त, और अपनी बुद्धि से रहब को छेद देता है।

१३उसकी आत्मा से आकाशमण्डल स्वच्छ हो जाता है, वह अपने हाथ से वेग से भागनेवाले नाग को मार देता है।

१४देखो, ये तो उसकी गति के किनारे ही हैं; और उसकी आहट फुसफुसाहट ही सी तो सुन पड़ती है, फिर उसके पराक्रम के गरजने का भेद कौन समझ सकता है?”

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